भारत के मशहूर बौद्ध मंदिर



बौद्ध धर्म भारत के प्राचीन धर्मों में से एक धर्म है जिसकी स्थापना भगवान गौतम बुद्ध ने की थी गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के विश्व धर्म के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने कि 45 वर्षों तक सत्य दार्शनिक शिक्षाविद ध्यान और आध्यात्मिक शिक्षा को जोर देते हुए इन शिक्षकों का विस्तार किया था गौतम बुद्ध अपने जीवन का अंतिम समय तक सत्य के मार्ग पर चलें और लोगों को हमेशा सत्य पर चलने और सही मार्ग चुनने के लिए प्रेरित करते हैं आज पूरे देश भर में गौतम बुध से जुड़े बहुत सारे स्तूप स्मारक और बौद्ध धर्म की संस्कृति उनके अनमोल वचनों को अपने अंदर समेटे हुए हैं और बौद्ध मंदिर के साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षक का केंद्र बना हुआ है बौद्ध धर्म का जन्म भारत में हुआ था बुध का जन्म रुबीना में 563 ईसा पूर्व क्षेत्रीय शुद्धोधन के घर में हुआ था भगवान नारायण का अवतार माना जाता है इसलिए बौद्ध धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म में भी भगवान बुध का बहुत ज्यादा महत्व माना जाता है देश में बुध के लिए कई मंदिर और बनाए गए हैं जिनमें से कुछ को ध्वस्त भी कर दिया गया लेकिन अभी देश में बहुत से मशहूर बौद्ध स्तूप और मौजूद हैं जो आज तीर्थ स्थल है बोला जाता है कि वैशाख माह की पूर्णिमा का दिन बहुत धर्म के अनुयायियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन होता है इसी दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में इसापुर 563 को हुआ था इस दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने बोधगया में एक वृक्ष के नीचे जाना की सत्य क्या है और इसी दिन हुए 80 वर्ष की उम्र में दुनिया का कुशीनगर में अलविदा कह गए थे

बोधगया बिहार :-

बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक मंदिर माना जाता है बोधगया बिहार की राजधानी पटना के दक्षिण पूरब में लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर स्थित है बोधगया गंगा की सहायक नदी फल्गु नदी के किनारे पश्चिम दिशा में स्थित बोधगया को पहले और बेला के नाम से भी जाना जाता था या 18 वीं शताब्दी तक सामोदी ब्रज आसन या महाबोधि के रूप में भी जाना जाता था यह चार महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों में से एक स्थल है बौद्ध द्वारा बोधगया को दुनिया की सबसे पवित्र शहरों में से एक माना जाता है क्योंकि इस स्थल पर बौद्ध वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध ने आत्मा ज्ञान प्राप्त किया था बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर को वर्ष 2002 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया था यहां बौद्ध धर्म को मनाने वालों के अलावा अन्य धर्मों के लोग भी पर्यटन स्थलों को देखने के लिए आते हैं ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर ज्ञान प्राप्त किया था महाबोधि मंदिर भारत में ही नहीं बल्कि पूरे देश विदेश में मशहूर है यहां हर दिन हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं इस मंदिर के यूनेस्को द्वारा दुनिया के सबसे पुरानी धरोहरों की सूची में शामिल है माना जाता है कि बोधगया के महाबोधि मंदिर में स्थापित भगवान बुद्ध की मूर्ति साक्षात उसी अवस्था में है जिस अवस्था में भगवान बुध बैठकर तपस्या की थी और वह मूर्ति स्वयं भगवान बुद्ध द्वारा स्थापित की गई थी भूत की यह मूर्ति बौद्धिक जगत में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त मूर्ति है नालंदा विक्रमशिला के मंदिरों में भी इसकी मूर्ति की प्रतिकृति को स्थापित किया गया है इस शहर में अशोक महान ने स्मारक का निर्माण कराया था 18 वीं शताब्दी तक बोधगया भगवान बुध के कारण बहुत प्रसिद्ध रहा लेकिन अचानक हुए राजनीतिक उथल-पुथल के कारण यह शहर कई शताब्दी तक उपेक्षित रहा शुरुआत में केवल आसपास के लोग यहां आते थे लेकिन आज के टाइम में पूरे देश विदेश के लोग भगवान बुद्ध की दर्शन करने के लिए आते हैं इस पवित्र स्थान पर विभिन्न देशों के तीर्थ यात्री अपने तरीके से पूजा करते हैं पवित्र देश को पढ़ते हैं मुख्य मंदिर के चारों ओर परिक्रमा लगाते हैं पवित्र बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर चिंतन करते हैं मोमबत्ती और घी के दीपक जलाते हैं बोधगया में घूमने के लिए बहुत से स्थान हैं वैसे तो बोधगया का सबसे मुख्य आकर्षक महाबोधि मंदिर है लेकिन इसके अलावा भी यहां कई रमणीय स्थल हैं जो देखने के लायक है जैसे कि बौद्ध वृक्ष वृक्ष वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध ने तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी माना जाता है कि यह पाठ मूल बोधि वृक्ष का ही एक भाग है जिसे राजा अशोक की बेटी श्रीलंका ले गई थी यहां पर महाबोधि मंदिर यह मंदिर बोधगया के मुख्य आकर्षण में से एक है इस मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था मंदिर का निर्माण साथ में सदी में मूल बोधि वृक्ष के चारों और किया गया है यहां पर ही थाई मठ है यह सोने से बने टाइलों से ढकी घुमा द्वारा और ढलान वाली यहां की मंदिर की ऊंचाई है वह 80 फीट की ऊंचाई पर बुद्ध प्रतिमा भगवान बुद्ध बोध गया से जुड़े धार्मिक और आध्यात्मिक स्मारकों में से एक है देश की सबसे ऊंची बुध मंदिरों में से एक है रचना 1989 में दलाई लामा द्वारा स्थापित की गई थी यह मंदिर बहुत ही आकर्षण देखने में लगती है

सारनाथ :- 

वाराणसी से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सारनाथ भारत के प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थलों में से एक अस्थल है वाराणसी के आसपास घूमने वाली जगह में से यह एक बेहद खास स्थान है काशी के घाटों और गलियों में घूमने के बाद आप इस जगह का आंकड़ा एकांत में शांति का अनुभव कर सकते हैं माना जाता है कि बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुध अपने पूर्व साथियों की तलाश में सारनाथ आए थे और उन्होंने यहां अपना पहला उपदेश दिया था यहीं से भगवान बुद्ध की धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया था सारनाथ कई बौद्ध स्तूप संग्रहालय प्राचीन स्थलों और सुंदर मंदिरों के साथ ऐतिहासिक चमत्कार का एक शहर है जो पर्यटकों के लिए बहुत ही आश्चर्य और विश्व में का कारण साबित होता है बोला जाता है कि सारनाथ को 10वीं शताब्दी ईसा पूर्व से ऐतिहासिक उथल-पुथल की एक श्रंखला से गुजरना पड़ा था लेकिन जब सम्राट अशोक ने इस स्थान पर विशेष रूचि ली और विशालकाय स्तूपोर जैसे शानदार ढांचे का निर्माण किया तो इस जगह का आकर्षण बढ़ा और दसवीं से बारहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जब विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा लंबे समय तक एक से एक बार आक्रमण किए तो आधुनिक उत्तर प्रदेश के कई शहर खत्म हो गए थे और सारनाथ को टुकड़ों में तोड़ दिया और 19वीं सदी के मध्य में सारनाथ को कुछ ब्रिटिश पूरा तत्वों द्वारा इसके ऐतिहासिक महत्व के चलते फिर से संरक्षित किया गया और बौद्ध धर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक स्थान साधना के रूप में प्राप्त किया गया बुद्ध पूर्णिमा को गौतम बुध के ज्ञान और मोक्ष के उत्सव के रूप में मनाया जाता है इस खास मौके पर अधिकांश बौद्ध स्थलों हर साल समारोह आयोजित किए जाते हैं और दुनिया भर के तीर्थ यात्री सारनाथ की यात्रा के लिए समय लेकर आते हैं यह त्यौहार पूर्णिमा की रात को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है इसलिए भारत में इस त्यौहार को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है इस पवित्र त्यौहार के दिन गरीब लोगों के लिए मुफ्त चिकित्सा शिविर के साथ-साथ दिनभर की प्रार्थना की जाती है सारनाथ में बहुत से स्थान है देखने के लिए जैसे कि सारनाथ का चौखंडी स्तूप उत्तर प्रदेश के सभी पवित्र तीर्थ स्थलों में से सबसे पवित्र और पर्यटकों द्वारा सबसे ज्यादा देखा जाने वाला बताया जाता है इसको बौद्ध संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण में से एक बताया जाता है इस स्तूप का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां भगवान बुद्धि बुद्धि की मुलाकात अपने पांच तपस्वी से हुई थी इनके द्वारा बुधनी शिक्षाओं का प्रचार किया यहां पर ही अशोक स्तंभ सारनाथ अशोक स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक और सम्राट अशोक की यात्रा का एक पत्थर से निर्मित अशोक स्तंभ का एक प्रभावशाली है जिसके सिर पर शेर है धन के साथ या 50 मीटर लंबा अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के लिए उपहार है यहां पर ही छाई मंदिर सारनाथ सारनाथ में एक प्रसिद्ध की वस्तु कला की रैली को प्रदर्शित करता है बता दें कि यह मंदिरों के बीच बना हुआ है जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और यहां पर आने के बाद शांति महसूस होता है और यहां पर शांतिपूर्ण प्रदान किया जाता है यहां पर ही तिब्बत सारनाथ सारनाथ के प्रमुख स्थलों में से एक है इस मंदिर को से सजाया गया है जो तिब्बत बौद्ध चित्र है इस मंदिर में बुध की एक मूर्ति है यहां मंदिर की इमारत के बाहर का प्रार्थना पैसों को देख सकते हैं जिन्हें घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है यहां पर ही सारनाथ का पुरातत्व संग्रहालय है जो कि 1910 में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व 12वीं में शताब्दी ईस्वी तक के कलाकृतियों के संग्रह को प्रदर्शित करता है यह संग्रहालय बहुत ही आकर्षक देखने में लगता है तो ऐसे ऐसे सारनाथ में बहुत सी चीजें देखने के लिए हैं जो कि आप भगवान बुद्ध की दर्शन करने के लिए आते हैं यहां पर बहुत सी चीजों के दर्शन करके आप जाइएगा सारनाथ आप हवाई जहाज से भी आ सकते हैं रेलगाड़ी से भी आप पहुंच सकते हैं बस से भी आप पहुंच सकते यहां पर सारी सुविधा दी गई है

लुम्बिनी :-

लुंबिनी बुद्ध का जन्म स्थल है विश्व भर में बुध के सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से लुंबिनी एक है यह नेपाल में रूपा देवी जिले में स्थित हैं लुंबिनी वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के लिए 29 वर्ष बिताए थे वर्तमान समय में लुंबिनी यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शुमार है इसे 1997 में यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया था नेपाल के इस तीर्थस्थल में हर साल हजारों की संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयाई यहां पर पर्यटन करने के लिए आते हैं और इस जगह को देखते हैं यह देखने में बहुत ही आकर्षक लगता है और अपने पर्यटक को अपनी तरफ आकर्षित करता है यह हिमालय पर्वत की गोद में बसी खूबसूरत जगह लुंबिनी है यह जगह भारत की सीमा के करीब पाल के रूपंदेही जिला में स्थित है जो बहुत शांत और बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है जो लगभग 2000 साल पुराना माने जाते हैं इस जगह को सम्राट अशोक के स्मारक स्तंभ के लिए भी जाना जाता है नेपाल की यात्रा करने वाले लोग लुंबिनी शास्त्रों का अध्ययन धर्म के बारे में जानने के लिए इस सुंदर जगह का दौरा करते हैं लुंबिनी में गौतम बुद्ध की मां माया देवी के नाम पर मंदिर भी है जिसको माया देवी मंदिर कहा जाता है

कुशीनगर :- 

उत्तर प्रदेश के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में गोरखपुर के पास स्थित कुशीनगर एक प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थल है माना जाता है कि भगवान बुद्ध की मृत्यु कुशीनगर में हुई थी जिसके बाद सम्राट अशोक ने परी निर्माण स्थल को चिन्हित करने के लिए यहां एक स्तूप बनवाया था उस रूप में बुध की पुन जीवित निर्माण प्रतिमा है जिसमें डाई और मरने वाले बुध की लेटी हुई प्रतिमा को स्थापित किया गया है उसी नगर एक धार्मिक शहर है जो बड़ी संख्या में पर्यटक और खासकर बौद्ध धर्म के अनुयाई अपनी और आकर्षित करता है उसी नगर के अन्य प्रमुख स्थलों में आप चैट रमभर स्तूप मध्य और कुछ लोकप्रिय छोटे-छोटे मंदिर देख सकते हैं यह मंदिर बहुत ही आकर्षित लगता है बोला जाता है कि महापरिनिर्वाण मंदिर कुशीनगर उत्तर प्रदेश में ही स्थित है इस मंदिर में बुध की 6 फीट लंबी मूर्ति है जो हमेशा एक चुनरी से ढकी रहती है और इसे मूर्ति का सिर्फ चेहरा दिखाई देता है यहां पर लोग देश-विदेश से भगवान बुद्ध की दर्शन करने के लिए आते हैं

सांची स्तूप मध्य प्रदेश :-

सांची स्तूप मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पूर्व में बेताब नदी के किनारे पर स्थित हैं सांची स्तूप भारत के सबसे प्रमुख बौद्ध स्थलों में से एक बौद्ध स्थल हैं सांची स्तूप को मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक की आज्ञा अनुसार तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था जो कि भगवान बुद्ध का बहुत ही आकर्षित मंदिर बनाया गया जहां भगवान बुद्ध के अवशेषों को रखा गया है और इस स्थान पर मौजूद मूर्तियों और स्मारकों में बौद्ध कला और वास्तुकला की अच्छी झलक देखने को मिलती है जो कि अपने पर्यटकों को आकर्षित करती है अपनी आकर्षित कलाकृतियों के लिए विश्वविख्यात है यूनेस्को द्वारा सांची स्तूप को 15 अक्टूबर 1982 को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया था सांची स्तूप को मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक की आज्ञा अनुसार तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था इस स्थान पर भगवान बुद्ध के अवशेषों को रखा गया है सांची नगर एक पहाड़ी के ऊपर बसा हुआ है और हरे भरे गानों से घिरा हुआ है जिसे यहां आने वाले पर्यटकों को शांति और आनंद का एहसास कराता है यहां पर देश-विदेश से लोग घूमने के लिए आते हैं ज्यादातर यहां पर बौद्ध धर्म के अनुयाई पर्यटक करने के लिए आते हैं और पर्यटक इस स्थान की ओर आकर्षित होते हैं इस स्थान और मौजूद मूर्तियां और स्मारकों में आपको बौद्ध कला और वास्तुकला की जो झलक दिखाई देती है वह बहुत ही रमणीय है सांची स्तूप स्तूप संख्या के नाम से भी जाना जाता है शादी में मंदिर और स्मारकों की स्थापना का कार्य तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के आदेश पर शुरू किया गया था और संपूर्ण निर्माण कार्य 12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक चला भारत का प्रथम इसी समय के दौरान बनाया गया था सांची स्तूप का गोला के रूप में भगवान बुध के अवशेषों के ऊपर बनाया गया है जिसके आधार पर एक उभरी हुई छत शिखर पर एक रेलिंग और पत्थर की छतरी होने से एक जैसी संरचना बनती है जो उच्च कोटि की होती है जिस की मूल संरचना का रचना का आधार है सांची स्तूप में पवित्र गोलार्ध में एक पोस्को है जिसे प्रवेश नहीं किया जा सकता है लेकिन इसके भीतर भगवान बुध के पवित्र एवं वास्तविक अवशेष रखे हुए हैं मध्य में स्थित हारिका या का वायर रेलिंग यहां के पवित्र स्थल के बारे में बताते हैं इस महान स्तूप में तीन गोलाकार छात्र डिस्क और बौद्ध धर्म के त्रिनेत्र हैं सम्राट अशोक ने भगवान के सम्मान में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सांची स्तूप का निर्माण करवाया था सांची की ऊंचाई लगभग 54 फीट ऊंचा है या स्तूप चार दरवाजे के बीच में है जो भगवान बुध और जातक की विभिन्न कथाओं के विभिन्न पहलुओं के वर्णित करते हैं सांची स्तूप यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में से एक विश्व धरोहर स्थल है इस स्तूप का भगवान बुद्ध के जीवन मृत्यु और पूर्व जन्म के चक्र से मोक्ष की प्राप्ति के रूप में जाना जाता है इस रूप में स्थापित अधिकार बौद्ध की प्रतिमा और एक मौर्यकालीन पॉलिश किया गया है जिससे प्रतिमा में कांच की तरह चमक आ गई है सांची में घूमने लायक बहुत से पर्यटन स्थल है



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